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Rajasthan Sikhs Team

खालसाई बोलबाले एवं आज़ादी का प्रतीक – खालसा साजना दिवस
By SuperAdmin





विसाखी का त्यौहार विश्व इतिहास में विशेष महत्व रखता है यह पर्व जो कि हर साल पंजाबी बहुल क्षेत्र में पूरे वैसाख महीने के शुरू होने पर मनाया जाता है पंजाब एवं पंजाबी बहुल क्षेत्रो में इस समय रबी की फसल की कटाई की जाती है परन्तु यह विसाखी का त्यौहार सन 1699 ईसवीं में इतिहासिक हो गया इस पवित्र दिन पर गुरुनानक देव जी से शुरू हुई चरण पाहूल के स्थान पर खंडे बाटे के अमृत संचार का प्रवाह शुरू हुआ इस अमृत छकने के साथ ही न्यारे खालसा पंथ प्रकट हुआ विश्व इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी नियत दिवस पर किसी कौम का जन्म हुआ इस प्रकार दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरुनानक देव द्वारा चलाये निर्मल सिख पंथ को 239 सालो की रुहनिअत कमाई के बाद अपनी अंतिम स्वरूप देकर न्यारे खालसा पंथ में तब्दील कर दिया सिर धर तली गली मेरी आऊ आते सिर दीजै काण न कीजे का जाप करते सिक्खों को विसाखी पर्व पर एक कठिन परीक्षा के माध्यम से खालसा रूप में आदर्श पूर्ण मनुष्य बना दिया विसाखी पर्व को विश्व इतिहास का यादगार बनाने के उदेश्य से दसम पातशाह ने 1699 के विसाखी पूर्व पर संगतों को भारी तादाद में आनंदपुर साहिब पहुँचने के लिए विशेष हुक्मनामे जारी किये वैसाखी के दरस पै सतिगुर कियो विचार कियो प्रगट तब खालसा चुकयो सरब जंजाल ( श्री गुर शोभा ) 1699 इसवी की विसाखी पर केशगढ़ आनंदपुर साहिब में भारी दीवान सजा , कीर्तन उपरांत गुरु जी ने अपनी किरपान म्यान में से निकाल कर गरजते हुए कहा कि कोई है ऐसा जो गुरु साहिबानो के उदेश्यों ,उपदेशो के लिए जान न्छावर करने के लिए तैयार हो यह सुनकर चारो और चुप्पी छा गई , तीसरी वार आवाज देने पर लाहोर के भाई दयाराम ने शीश भेंट किया गुरु जी भाई दयाराम को नजदीक लगे छोटे तम्बू में ले गये दीवान में बैठी संगत ने किसी चीज के जमीन पर गिरने की आवाज सुनी ,संगत में आकर खून से लथपथ किरपान गुरु जी ने फिर लहराई एवं एक शीश की और मांग की इस वार दिल्ली के रहने वाले भाई धरमदास जी आये तीसरी बार जगनाथ पूरी उड़ीसा के एक रसोइये सिक्ख भाई हिम्मत राय , चौथी वार द्वारका गुजरात के छिम्पा समाज से मोहकम चंद तथा पांचवी वार बीदर कर्नाटक से सैन भाई साहिब चंद ने शीश भेंट किये गुरु साहिब जी उनको सुन्दर पोशाके पहनाकर तम्बू से बाहर संगत के सामने लेकर आये , अमृत तैयार किया और पांचो सिक्खों को अमृतपान करवाकर उनको सिंघ शब्द भेंट करके पांच प्यारो की पदवी दी गयी फिर उन पांच प्यारो से खुद अमृतपान किया एवं सांसरिक इतिहास में इन्कलाबी कदम उठाया गया ,गुरु विलास पातसाही दंसवी में इस अलोकिक घटना को भावपूर्ण शब्दों में बयान करते हुए लिखा गया है कि गुरु गोबिंद सिंह जी सिंहासन से नीचे उतर कर आये दोनों हाथो को जोड़कर पांचो प्यारो से विनती की मुझे भी अमृत की दात बख्शो , अब जट , गैर जट , उच्च नीच, पिछड़े , दलित ,गुरु शिष्य का कोई अंतर नही रह गया ऊतर सिंघासन जुग कर जोरी ।अमृत लेत आप सुख गोरी । बैस सुदर ऐ जाट अपारा । ता को पंथ माह मै धारा । सभ जग राज तोही को दीना पुन्न बिधि सो तुम दो गुर कीना ( गुर शोभा ) यह विनम्रपूर्व आग्रह सुनकर पांच प्यारे चुप हो गये बाद में पांचो प्यारो में से भाई दया सिंह ने कहा कि पातशाह आपके द्वारा प्राप्त किया है अब हम क्या करे , गुरु शिष्य का भेद मिटाने वाले दसवें पातशाह ने कहा कि सावधान होकर मुझे भी अमृत की दात बख्श दो , कोई संदेह न रखो , यह पंथ खालसा वाहेगुरु ने खुद सजाया है मै भी उस का निमाना सेवक हूँ । सावधान होकर मुझे भी अमृत की दात बख्शो जिस तरह आपने अमृत छका है उसी प्रकार मुझे भी छकाओ एवं अपने साथ मिलाकर मेरे पर खालसा होने की मोहर लगाओ जिस प्रकार गुरु तेग बहादुर जी और मेरे में कोई अंतर नही ठीक उसी प्रकार मेरे और तुम्हारे में अब कोई फर्क नही है जा विधि अमृत तुम गुर पायो । तैसे मोहि मिलायो भायो । उत पोत गुर सिख जद जानो । जैसे नोम गुर संग सो मानो ( गुर विलास पातशाही दसवीं ) इस पावन अवसर पर श्री आनंदपुर साहिब में अहमद शाह बटालवी जो की औरंगजेब का मुखबिर खबर नवीस था उसने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा कि , गुरु गोबिंद सिंह ने फ़रमाया ,” मै चाहता हूँ कि आप सभी एक रस्ते पर चलो एक धर्म को अपनाओ अलग अलग जाति के भेदभावो को मिटा दो हिन्दुओं की चार जातियो का वर्णन शस्त्रों में किया है उन जाति व्यवस्था को जड़ से उखाड़ दो एक दुसरे से खुल कर दुसरो से मिलो ,कोई एक दुसरे को उच्च जाति एवं वडी जाति का न समझे राम कृष्ण , ब्रह्मा एवं दुर्गा आदि को पूजने की कोई जरुरत नही है सिर्फ गुरु नानक एवं बाकि गुरुओ पर विश्वास जमाओ ,सारे एक खंडे बाटे में से अमृत छको एवं एक दुसरे से प्यार करो “ उसके बाद आपजी ने रहित मर्यादा दृढ करवाई कर अरदास रहत की भले । पंचामृत अड पांचऊ मिले । जात पात को भेद न कोई । चार वर्ण अचवहि इक होई । मति उच्ची राखहु मन नीवां । सिमरहू वाहिगुरू सुख सीवां । गौर मडी अर पंथ अनेका । आन न मानहि राख विवेका । ( श्री गुर प्रताप सूरज ग्रन्थ ) श्री गुरु गोबिंद सिंह ने खालसे को अनेक बख्शीशे देते हुए फ़रमाया कि खालसा अकाल पुरख का अभेद एवं स्वरूप है सही अर्थो में वह वाहिगुरू का है और वाहेगुरु उसका , श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने यहाँ तक कहा कि आज के बाद मेरा सबकुछ खालसे पंथ का ही है खालसा मेरा मुख है अंगा । खालसे को हऊ सद सद संगा । ( सरब लोह ग्रन्थ ) इस प्रकार गुरु गोबिंद सिंह जी ने विसाखी पर्व पर आनंदपुर साहिब की धरती पर जो अलोकिक चमत्कार किया उसके बारे में पश्चमी इतिहासकार ईबसटन ने ठीक लिखा कि हिंदुस्तान के लम्बे इतिहास में वार पहली कोई धर्म राजनितिक बना एक ऐसी कौम का जन्म हुआ जिसे यहाँ के लोगो ने पहली वार देखा दलित पिछड़े लोगो को जिन्हाने कभी शस्त्रों ( हथियारों ) को हाथ तक नही लगाया था गुरु जी अगवाई में वह कौम इस समाज में राजस्थापति की और बढ़ी उनमे वह सभी गुण आ गये जो जुल्म की बढ़ रही लहर को रोकने के लिए चट्टान बन गये , बंद बंद कटवाकर खोपरी उतरवा लेते पर सिख आदर्शो को कभी नही छोड़ते रहिणी रहै सोई सिक्ख मेरा तू साहिब मै उसका चेरा । जब तक सिक्ख रहित पर कायम है तब तक वह सिख है और मै उसका गुरु हूँ अन्यथा हमारा कोई सबंध नही विसाखी के शुभ अवसर पर समूह संगत को वधाई देते हुए गुरु को निवेदन करता हूँ जिस प्रकार आप गुरु साहिबानो ने परिवारवार क्र शहीद सिक्खों ने अपना तन मन धन नाछावर कर मानवता को बचाया आज के दौर में हम उसी दौर में दुबारा खड़े है आप कृपा करो आप के माध्यम से वाहेगुरु द्वारा सजाया खालसा इतिहास को दोहराकर मानवता को बचाए “दान दीऊ इन ही को भलो और दान न लागत नीको इन ते गहि पंडित ऊपजाऊ कथा कर्ण की रीत सिखाऊ” “इन गरीब सिंघन को देऊ पातशाही ये याद करे हमरी गुरराई जीवत रहे तो राज करे है मरहि ता गुर पुर जाई “। प्रो बलजिंदर सिंह मोरजण्ड 9414501984 baljindersinghnehra@gmail.com

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